काव्य: दिल की सुखी ज़मीं – अक्स

Poetry & Shayari

रात की स्याही से काले कागज़ को संवारा है
ज़मीं थी सुखी मेरी और तूने उसे उजाड़ा है

छोड़ भंवर में मुझको, तुम चली गयी कहाँ
अब टूटी है कश्ती मेरी और दूर बहुत किनारा है
ज़मीं थी सुखी मेरी और तूने उसे उजाड़ा है….

आ रहे हैं याद मुझको, वो हर महकते पल
जब तेरे इंतज़ार में मैंने, लम्हा-लम्हा गुज़ारा है
ज़मीं थी सुखी मेरी और तूने उसे उजाड़ा है….

मेरे टूटे दिल की, अब कौन करेगा इज़्ज़त यहाँ
वक़्त के मरहम का ही, बस मुझको सहारा है
ज़मीं थी सुखी मेरी और तूने उसे उजाड़ा है….

इस कदर क्युँ, अपना रंग दिखाया तुमने सनम
जाने किस गली में, जमीर रह गया तुम्हारा है
ज़मीं थी सुखी मेरी और तूने उसे उजाड़ा है….

खुश तो तुम हो मगर, शायद ये तुमको पता नहीं
यादों से हो हार गयी, तन्हाई ने तुमको मारा है
ज़मीं थी सुखी मेरी और तूने उसे उजाड़ा है….

जो निगाहें कभी, दीदार-ए-मोहब्बत करती थीं
उनसे आज देखो, बह रही अश्रु धारा है
ज़मीं थी सुखी मेरी और तूने उसे उजाड़ा है….

यही खता थी मेरी, जो कह दिया सबके सामने
ओ मेरे जाने जिगर, तू जहाँ में सबसे प्यारा है
ज़मीं थी सुखी मेरी और तूने उसे उजाड़ा है….

दुनिया की नज़रों से यूँ, भागकर जाओगे कहाँ
अब तो बचाने वाला, कोई नहीं तुम्हारा है
ज़मीं थी सुखी मेरी और तूने उसे उजाड़ा है….

थी आज़ादी की चाहत, तो एक बार कह देती मुझे
सौ दफा अपनी आँखों से, मैंने मोती को भी उतारा है
ज़मीं थी सुखी मेरी और तूने उसे उजाड़ा है…. 

— अक्स

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