काव्य: अरमां मचल जाए – अक्स

Poetry & Shayari

रखा अपने अरमां को सहेजकर दिल में
ना जाने कब ये अरमां मचल जाए

तू नहीं है जीवन में, क्या ख्वाइश अब रखूं मैं
काश मेरी किस्मत पे, मेरा बस चल जाये
ना जाने कब ये अरमां मचल जाए…

मुझे फूंकने से पहले मेरा दिल निकाल लेना
ये किसी की है अमानत, कहीं ये भी जल ना जाये
ना जाने कब ये अरमां मचल जाए…

नहीं करता याद मैं, तुझको मेरे दिलबर
तेरा ख्याल बस आकर, मुझे खुद से छल जाए
ना जाने कब ये अरमां मचल जाए…

अपनी कमसिन अदाओं को, ज़ाहिर कभी ना करना
बेबसी के आलम में, तेरी शर्म ना निकल जाए
ना जाने कब ये अरमां मचल जाए…

तन्हाइयों की बरात में, दिन निकलता है आजकल
एक बार हंस दे तू, तो मेरा दिल बहल जाए
ना जाने कब ये अरमां मचल जाए…

गर मचलते अरमां, तो कुछ ऐसा हो जाता
तेरी सांसो की गर्मी से, ये चाँद पिघल जाये
ना जाने कब ये अरमां मचल जाए…

कर लूँ सारे अरमां पुरे, कोई ख्वाइश ना रहे
मिलन से पहले कहीं, ये शाम ना ढल जाए
ना जाने कब ये अरमां मचल जाए…

— अक्स

 

 

 

 

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